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एक मुलाजिम की किस्मत

मुलाजिम हूँ दूसरों की सुनना मेरा हक है
इसी बात की तनख्वाह है, जिससे मेरा घर जगमग है
बात बराबर है, किसी एक को चुन लो
दफ्तर ना हो तो घर में सुन लो
बेहतर है की दफ्तर में ही सुन लो
न तो खाली जेब ही अपने सपने बुन लो
बस ऐसे सुनने सुनाने के किस्से ज़िन्दगी भर चलते रहेंगे
और यूँ ही सुन सुन कर बच्चे अपने पलते रहेंगे
-अनिरुद्ध शर्मा

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